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कौसानी इंटर कॉलेज में अंधविश्वास का साया: 90 साल पुराने संस्थान पर संकट के बादल…

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उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थल कौसानी से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। शिक्षा के क्षेत्र में अपनी ऐतिहासिक पहचान रखने वाला राजकीय इंटर कॉलेज कौसानी इन दिनों अंधविश्वास, तंत्र-मंत्र और कथित साजिशों के कारण सुर्खियों में है।

साल 1933 में स्थापित यह प्रतिष्ठित विद्यालय, जो कभी शिक्षा और संस्कार का केंद्र माना जाता था, अब भय और विवाद के माहौल से जूझ रहा है। आरोप है कि पिछले करीब पांच वर्षों से कुछ असामाजिक और कथित तांत्रिक तत्व रात के अंधेरे में स्कूल परिसर में घुसते हैं। बताया जा रहा है कि स्कूल गेट के पास चूल्हा बनाकर पशु बलि दी जाती है, साथ ही शराब और मांस का सेवन कर परिसर को दूषित किया जाता है।

सुबह जब छात्र स्कूल पहुंचते हैं, तो उन्हें इन गतिविधियों के अवशेष देखने पड़ते हैं, जिससे उनमें डर और मानसिक तनाव बढ़ रहा है। स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विद्यालय में छात्र संख्या घटकर लगभग 210 रह गई है।

अभिभावकों का आरोप है कि यह सब एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा हो सकता है, जिसका उद्देश्य इस ऐतिहासिक विद्यालय की छवि खराब कर उसे बंद करवाना है।

इस बीच, अभिभावकों ने अंधविश्वास और नकारात्मक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए सामूहिक प्रयास करते हुए स्कूल परिसर में भूमिया देवता का मंदिर स्थापित किया और वहां सात्विक पूजा-पाठ शुरू किया। हालांकि, इस कदम के बाद विवाद और बढ़ गया। कुछ विरोधी तत्वों ने इस मंदिर को ही “भूत का मंदिर” बताकर नई अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं।

विद्यालय के प्रधानाचार्य ताजबर सिंह नेगी के अनुसार, ये घटनाएं लंबे समय से हो रही हैं और स्कूल प्रशासन लगातार इन्हें रोकने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने बताया कि बच्चों की काउंसिलिंग कराई जा रही है और यदि कोई छात्र हिस्टीरिया जैसी समस्या से ग्रसित होता है, तो उसे तुरंत स्वास्थ्य केंद्र भेजा जाता है।

वहीं पीटीआई अध्यक्ष ने इन सभी भूत-प्रेत और तांत्रिक दावों को पूरी तरह निराधार बताया है। उनका कहना है कि कुछ फर्जी तांत्रिक और असामाजिक तत्व जानबूझकर माहौल खराब कर रहे हैं, ताकि छात्रों और अभिभावकों को भ्रमित किया जा सके।

अब बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन घटनाओं के पीछे कौन लोग हैं? क्या यह सच में अंधविश्वास है या किसी बड़ी साजिश का हिस्सा?

प्रशासन की जांच के बाद ही स्थिति साफ हो पाएगी। फिलहाल, सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या इस ऐतिहासिक शिक्षण संस्थान को अंधविश्वास के अंधेरे से बाहर निकाला जा सकेगा या नहीं।

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