देश को आज़ाद हुए 80 साल हो चुके हैं। देश विकास की नई ऊंचाइयों को छूने का दावा कर रहा है, लेकिन उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का गिन्नी गिरगांव आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।
आज़ादी के आठ दशक बाद भी गांव की तस्वीर पूरी तरह नहीं बदल पाई है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और दूसरी जरूरी सुविधाओं की कमी ने ग्रामीणों की जिंदगी मुश्किल बना रखी है।
यहां सवाल सिर्फ विकास का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है, जो आजादी के इतने वर्षों बाद भी गांव की मूलभूत जरूरतें पूरी नहीं कर पाई।

ग्रामीणों का सवाल है—आखिर कब पहुंचेगी विकास की रोशनी गिन्नी गिरगांव तक? आखिर कब सुधरेगी सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था?
एक तरफ शहरों में आधुनिक सुविधाओं और विकास की बड़ी-बड़ी तस्वीरें दिखाई जाती हैं, तो दूसरी तरफ पहाड़ के दूरस्थ गांव आज भी सड़क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए इंतजार कर रहे हैं।
गिन्नी गिरगांव की कहानी सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। यह पहाड़ के उन तमाम गांवों की तस्वीर है, जहां लोग आज भी बेहतर सड़क, इलाज, शिक्षा और सुविधाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
80 साल की आज़ादी के बाद अब सवाल सीधा है—क्या विकास की रोशनी हर गांव तक पहुंचेगी? और गिन्नी गिरगांव की सुध आखिर कब ली जाएगी?
अब निगाहें जिम्मेदारों पर हैं… और इंतजार है उस दिन का, जब गिन्नी गिरगांव भी विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह जुड़ सके।




