उत्तराखंड की आस्था, परंपरा और हिमालयी संस्कृति का सबसे भव्य पर्व…
विश्व प्रसिद्ध नंदा राजजात यात्रा 12 साल के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर शुरू हो गई है।
5 सितंबर से चमोली जिले के सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर और नौटी गांव से मां नंदा की राजजात यात्रा का शुभारंभ हुआ।
हजारों श्रद्धालुओं के जयकारों से पूरा हिमालय गूंज उठा।
यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि उत्तराखंड की उस भावुक परंपरा का प्रतीक है, जिसमें मां नंदा को बेटी का स्वरूप मानकर उन्हें मायके से ससुराल विदा किया जाता है।
मान्यता है कि मां नंदा उत्तराखंड की बेटी हैं।
इसी भाव के साथ श्रद्धालु कठिन पहाड़ी रास्तों, दुर्गम जंगलों और ऊंची हिमालयी चोटियों को पार करते हुए मां नंदा की डोली के साथ आगे बढ़ते हैं।

इस ऐतिहासिक यात्रा की सबसे खास पहचान है—
चार सींगों वाला मेढ़ा, यानी चौसिंग्या खाडू।
मान्यता के अनुसार चौसिंग्या खाडू मां नंदा की यात्रा का मार्गदर्शक और विशेष प्रतीक माना जाता है। इसकी मौजूदगी नंदा राजजात की परंपरा को और भी अद्भुत बना देती है।
कठिन रास्ते…
दुर्गम पहाड़…
बदलता मौसम…
और हजारों श्रद्धालुओं के कदम…
लेकिन आस्था के आगे हर मुश्किल छोटी पड़ जाती है।
हर पड़ाव पर एक ही जयकारा गूंज रहा है—
“जय मां नंदा… जय नंदा देवी!”
श्रद्धालु भक्ति और भावनाओं से सराबोर होकर मां नंदा की डोली के साथ हिमालय की ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं।
12 साल के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर उत्तराखंड की धरती मां नंदा की भक्ति में डूब गई है।
क्योंकि नंदा राजजात सिर्फ एक यात्रा नहीं…
यह बेटी के मायके से ससुराल तक की भावुक विदाई है।
यह उत्तराखंड की सदियों पुरानी आस्था है…
यह हिमालय की संस्कृति है…
और यह उस रिश्ते की कहानी है, जहां मां नंदा को आज भी उत्तराखंड की बेटी मानकर पूरे सम्मान और प्रेम के साथ विदा किया जाता है।






