रामनगर के पुछड़ी नई बस्ती में अतिक्रमण हटाओ अभियान के बाद अब इसके सियासी असर की चर्चा तेज हो गई है। दो चरणों में हुई कार्रवाई में 133 परिवारों के मकान ध्वस्त किए जा चुके हैं। शनिवार को 28 बुलडोजरों ने महज छह घंटे में वर्षों से खड़े भवनों को मलबे में तब्दील कर दिया। अब बेघर हुए परिवार दूसरी जगहों पर बसेंगे, तो सवाल उठ रहा है कि क्या इसका असर आने वाले चुनावों में स्थानीय नेताओं के वोट बैंक पर भी पड़ेगा?
रामनगर के पुछड़ी गांव में वन विभाग की सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई ने कई परिवारों को बेघर कर दिया है। वर्षों से बने मकान देखते ही देखते मलबे में तब्दील हो गए। शनिवार को प्रशासन की कार्रवाई के दौरान अलग-अलग स्थानों पर एक साथ 28 बुलडोजर गरजे और महज छह घंटे के भीतर कई भवनों को ध्वस्त कर दिया गया।

कार्रवाई के बाद पूरे इलाके में जहां नजर गई, वहां मकानों के मलबे के ढेर दिखाई दिए। जिन भवनों में कभी परिवार रहते थे, वहां अब सिर्फ टूटे निर्माण के अवशेष नजर आ रहे हैं।
पुछड़ी नई बस्ती में दो चरणों में कुल 133 परिवारों के मकान ध्वस्त किए गए हैं। पिछले वर्ष पहले चरण में 52 मकानों को तोड़ा गया था, जबकि शनिवार को दूसरे चरण की कार्रवाई में 81 मकानों को ध्वस्त किया गया।
इस कार्रवाई के बाद प्रभावित परिवारों के सामने अब दूसरी जगह बसने की चुनौती है। ऐसे में इसका असर स्थानीय राजनीति पर पड़ने की संभावना भी जताई जा रही है। माना जा रहा है कि विस्थापन के कारण स्थानीय मतदाताओं के भौगोलिक वितरण में बदलाव आ सकता है, जिसका असर चुनाव लड़ने वाले नेताओं के समीकरण पर पड़ सकता है।
यदि प्रत्येक प्रभावित परिवार में औसतन चार मतदाता भी मानें, तो 133 परिवारों के हिसाब से करीब 532 वोटों का सवाल खड़ा होता है। हालांकि, वास्तविक चुनावी असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कितने मतदाता दूसरी जगह बसते हैं और मतदाता सूची में उनकी स्थिति क्या रहती है।
फिलहाल पुछड़ी में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद प्रभावित परिवारों के सामने आशियाने का संकट है। वहीं, आने वाले समय में यह देखना भी अहम होगा कि इस कार्रवाई का स्थानीय राजनीति और चुनावी समीकरणों पर कितना असर पड़ता है।






